Special Report | Jharkhand

झारखंड में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाया है। इस बार मामला AIIMS देओघर के बर्न्स वार्ड (जलने के मरीजों का विशेष वार्ड) से जुड़ा हुआ है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से पूछा है कि बर्न्स वार्ड को सही ढंग से संचालित करने के लिए अब तक क्या-क्या ठोस कदम उठाए गए हैं।
हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए कहा है कि स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं है, खासकर तब जब मामला गंभीर रूप से झुलसे मरीजों की जान से जुड़ा हो।
बर्न्स वार्ड क्यों है इतना जरूरी?
बर्न्स वार्ड किसी भी बड़े अस्पताल का अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण विभाग होता है। यहां इलाज के लिए आने वाले मरीज आमतौर पर—
- आग से झुलसने
- एसिड अटैक
- बिजली से जलने
- रासायनिक दुर्घटना
जैसी गंभीर परिस्थितियों से जूझ रहे होते हैं।
इन मरीजों को विशेष डॉक्टर, प्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ, आधुनिक उपकरण, स्वच्छ वातावरण और चौबीसों घंटे निगरानी की जरूरत होती है। ऐसे में यदि बर्न्स वार्ड पूरी तरह कार्यशील न हो, तो मरीजों की जान खतरे में पड़ सकती है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
झारखंड हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“AIIMS देओघर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से यह उम्मीद की जाती है कि वहां की स्वास्थ्य सेवाएं उच्च स्तर की हों। यदि बर्न्स वार्ड सही तरीके से कार्य नहीं कर रहा है, तो यह बेहद गंभीर विषय है।”
कोर्ट ने AIIMS देओघर प्रशासन को निर्देश दिया है कि वे शपथ पत्र के माध्यम से यह बताएं—
- बर्न्स वार्ड फिलहाल किस स्थिति में है
- कितने बेड उपलब्ध हैं
- कितने विशेषज्ञ डॉक्टर तैनात हैं
- नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल स्टाफ की स्थिति क्या है
- आधुनिक उपकरण और दवाइयों की उपलब्धता है या नहीं
AIIMS देओघर से जुड़ी शिकायतें
हाईकोर्ट के संज्ञान में यह मामला स्वास्थ्य सेवाओं में कमी और मरीजों को हो रही परेशानियों के आधार पर आया है। बताया जा रहा है कि—
- बर्न्स वार्ड पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर रहा
- गंभीर मरीजों को बाहर रेफर करना पड़ रहा है
- विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी है
- जरूरी उपकरणों की उपलब्धता पर सवाल हैं
इन शिकायतों को नजरअंदाज नहीं करते हुए कोर्ट ने राज्य और केंद्र दोनों से जवाब मांगा है।
कोर्ट की कड़ी नजर स्वास्थ्य व्यवस्था पर
यह पहला मौका नहीं है जब झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं पर सवाल उठाए हों। इससे पहले भी कोर्ट—
- सरकारी अस्पतालों की बदहाल स्थिति
- डॉक्टरों की अनुपस्थिति
- दवाइयों की कमी
- मेडिकल कॉलेजों में अव्यवस्थाओं
को लेकर सरकार को फटकार लगा चुका है।
कोर्ट का साफ कहना है कि स्वास्थ्य नागरिकों का मूल अधिकार है, और इसमें लापरवाही सीधे-सीधे संविधान का उल्लंघन है।
AIIMS देओघर: बड़ी उम्मीदें, बड़ी जिम्मेदारी
AIIMS देओघर को झारखंड के लोगों के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य सौगात माना गया था। खासकर संताल परगना, दुमका, देवघर, गोड्डा और आसपास के जिलों के लोगों को इससे बड़ी राहत मिलने की उम्मीद थी।
लेकिन यदि ऐसे संस्थान में भी—
- बर्न्स वार्ड पूरी तरह चालू न हो
- गंभीर मरीजों को बाहर भेजना पड़े
तो यह पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करता है।
स्वास्थ्य सेवा सुधार पर कोर्ट का संदेश
हाईकोर्ट का यह आदेश सिर्फ AIIMS देओघर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए एक चेतावनी है।
कोर्ट यह साफ संदेश देना चाहता है कि—
- कागजों पर नहीं, जमीन पर सुधार दिखना चाहिए
- बड़े नाम वाले संस्थानों को और ज्यादा जिम्मेदार होना होगा
- मरीजों की जान से कोई समझौता नहीं चलेगा
आम जनता की प्रतिक्रिया
इस मामले के सामने आने के बाद आम लोगों में भी चर्चा तेज हो गई है। लोगों का कहना है कि—
“अगर AIIMS जैसे संस्थान में भी इलाज की पूरी सुविधा नहीं मिलेगी, तो गरीब और ग्रामीण मरीज कहां जाएंगे?”
सोशल मीडिया पर भी लोग स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार की मांग कर रहे हैं।









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